Tuesday, 28 June 2016

अब आगे क्या ? (UK's EU referendum, 2016)

वह बृहस्पतिवार का दिन था - तारीख 23 जून 2016  - जब एक जनमत संग्रह के लिए मतदान किया जाने वाला था. इसमें वोटिंग के लिए सही उम्र के लगभग सभी लोग वोट कर सकते थे वे फैसला लेने वाले थे कि यूके को  योरोपीय संघ का सदस्य बना रहना चाहिए या उसे छोड़ देना चाहिए. 
इस जनमत संग्रह में  30 मिलियन से अधिक लोगों ने मतदान किया। यह 1992 के आम चुनाव के बाद से ब्रिटेन के मतदान में सबसे अधिक संख्या थी। सभी यूके के भविष्य निर्धारण करने में अपना योगदान देने के इच्छुक थे. 
24 जून की सुबह यूके  निवासियों को नाश्ते की मेज पर इस जनमत संग्रह का फैसला भी मिला. जिसने जहाँ खासकर अधिकाँश लन्दन वासियों को शॉक में डाला वहीं बहुत लोग इससे बेहद खुश हुए.  इस रेफेरेंडोम के अनुसार 52 प्रतिशत मतदाताओं ने यूरोपीय संघ से बाहर होने के पक्ष में अपना वोट दिया. यूके की जनता ने यूरोपीय संघ छोड़ने का निर्णय किया था. वह अलग होकर अपने फैसले खुद लेना चाहते हैं. अपने पैसे, कानून और व्यवस्था का इस्तेमाल स्वयं अपने मूल्यों पर करना चाहते हैं.  यह एक एतिहासिक दिन बन गया और इस फैसले के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने अपने पद से इस्तीफ़ा देने की घोषणा कर दी.
अभी लगभग 2 साल पहले की ही बात है जब यूके के ही एक हिस्से स्कॉटलैंड में भी इसी तरह का एक जनमत संग्रह हुआ था जहाँ स्कॉटलैंड वासियों को यूके में बने रहने और यूके से अलग होने के लिए अपना वोट देना था. तब इंग्लैंड सहित पूरे देश ने "एकता में ही शक्ति है" जैसा नारा दिया था तब स्कॉटलैंड वासियों ने इसका मान रखते हुए यूके  साथ रहने के पक्ष में अपने वोट दिए थे. और अब उसी ग्रेट ब्रिटेन ने स्वयं ईयू से अलग होने का निर्णय किया है. 
गौरतलब है कि पूर्वोत्तर इंग्लैंड, वेल्स और मिडलैंड्स में अधिकतर मतदाताओं ने यूरोपीय संघ से अलग होना पसंद किया है जबकि लंदन, स्कॉटलैंड और नॉर्दन आयरलैंड के ज्यादातर मतदाता यूरोपीय संघ के साथ ही रहना चाहते थे. और अब सम्भावनाएं जताई जा रही हैं कि अब कम से कम स्कॉटलैंड और नॉर्दन आयरलैंड यूके से अलग होकर यूरोपीय संघ में शामिल होना चाहेंगे. और युनाईटेड किंगडम शायद इतना युनाईटेड नहीं रह जाएगा. 
ज़ाहिर है कि EU छोड़ने के पक्ष में जिन्होंने अपना मत दिया उनमें लन्दन से बाहर के बुजुर्गों की संख्या सर्वाधिक थी जो पिछले दस साल में दूसरे देशों से ब्रिटेन में आकर बसने वालों की बढ़ती संख्या से बहुत प्रसन्न नहीं हैं और उन्हें लगता है कि इनके आने से उन्हें मिलने वाले बेनेफिट्स और नौकरियों में कटौती हुई है. देश में बढ़ते रोड साइड अपराध, चोरियां और बिगड़ती व्यवस्थाओं की वजह भी अप्रवासियों को माना जाता रहा है. 
ईयू से अलग होने की एक मजबूत वजह यह भी बताई जाती रही कि अगर ब्रिटेन ईयू से हटता है तो देश की सरकारी स्वास्थ्य  संस्था NHS अपनी जर्जर स्थिति से उबर जायेगी क्योंकि ईयू को हर हफ्ते दी जाने वाली राशि ब्रिटेन अपनी इस स्वास्थ्य योजना पर इस्तेमाल कर सकेगा.

पिछले 20 वर्षों से यूके  में रह रही एक गृहणी संगीता शाह का कहना है कि उन्होंने देखा है कि कैसे पिछले सालों में ईयू इमिग्रेशन का कानून बदला गया है और कैसे हाल में हुए बदलावों का ब्रिटेन पर एक नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, उनका कहना है कि हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे -: स्कूल प्रवेश, आवास और साथ ही अपराध दर पर बहुत असर पड़ रहा है । उनका  मानना है कि ये अप्रवासी बेनेफिट्स का अतिरिक्त लाभ लेते हैं, जो उन्हें ब्रिटेन करदाताओं के मेहनत से कमाए पैसे का दुरुपयोग लगता है । उनका कहना है कि वे अपने बच्चों और भावी पीढ़ियों के लिए ऐसा जीवन नहीं चाहती इसलिए उन्होंने जीवन यापन के लिए बढ़ने वाली कीमतों के खतरे के वावजूद ईयू के निकलने के पक्ष में अपना वोट दिया. 

वहीं एक जर्मन ट्रेड फेयर कंपनी में एक हेड , लन्दन निवासी बिंदिया वर्मा इस फैसले से आहत हैं.उनके लिए यह फैसला पूरी तरह अनपेक्षित था और एक बहुत बड़े आघात के रूप में आया है. उनके अनुसार इस फैसले का बड़ा प्रभाव उन जैसी कंपनी पर पड़ेगा क्योंकि कंपनियां अब अपना निवेश रोक सकती हैं जब तक कि ईयू और दुनिया के बाकि देशों से अधिक भरोसे वाली ताज़ा डील सामने न आये. वे अपने उन युरोपीय दोस्तों के लिए भी दुखी हैं जिन्होंने ब्रिटेन को अपना घर बना लिया है और अब वे खुद को यहाँ अप्रिय और अवांछित महसूस करेंगे. बिंदिया कहती हैं कि यही नहीं बल्कि शायद इस फैसले से हमने अपने बच्चों एवं भावी पीढी से बिना सीमा बंदी के यूरोप यात्रा और काम करने के अवसरों को भी छीन लिया है. 

आंकड़ों के अनुसार ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर होने के फ़ैसले के बाद दुनिया भर में बाज़ार में गिरावट देखने को मिल रही है.अकेले ब्रिटेन के स्टॉक मार्किट में ही एक सौ पच्चीस बिलियन का नुक्सान हुआ है. 
इस फैसले से अधिकाँश युवा वर्ग अधिक निराश दिखाई देता है. खासकर लन्दन जैसे बहु संस्कृति वाले शहर के लिए तो यह फैसला दुखद नहीं तो थोड़ा निराशाजनक अवश्य दिखाई पड़ता है. 

लन्दन में इकोनिमिक्स की एक छात्रा सोम्या के अनुसार भी यह फैसला ठीक नहीं है वह कहती है कि हम पहले से ही माइनस -3294 मिलियन पाउंड्स के क़र्ज़ में हैं अब व्यापार में नुक्सान और अधिक हो सकता है. 

जो भी हो, यह कहा जा सकता है कि यह हो सकता है कि इस फैसले के कुछ दूरगामी फायदे निकल कर आयें. हो सकता है कि ईयू की सरपरस्ती से निकल कर यूके अपना अलग दृण निर्माण करे. ईयू से निकल कर बाकि दुनिया के देशों से व्यापारिक रिश्तों में बढ़ोतरी की संभावनाएं जताई जा रही हैं परन्तु यह भी ज़ाहिर है कि फिलहाल यूके की अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा और जीवन यापन की कीमत बढ़ेगी. इसमें कोई संदेह नहीं अपने पैरों पर खड़े होकर सफलता तक तक पहुँचने के लिए यूके को एक लंबा और कठिनाई से भरा रास्ता पार करना होगा. 

इस एतिहासिक फैसले से यूके, कठिनाई की आग में तप कर, निखर कर निकलेगा या टूट कर बिखर जाएगा- यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा.



Wednesday, 22 June 2016

आर या पार ...

बस एक दिन बचा है. EU के साथ या EU के बाहर. मैं अब तक कंफ्यूज हूँ. दिल कुछ कहता है और दिमाग कुछ और

दिल कहता है, बंटवारे से किसका भला हुआ है आजतक. मनुष्य एक सामाजिक- पारिवारिक प्राणी है. एक हद तक सीमाएं ठीक हैं. परन्तु एकदम अलग- थलग हो जाना पता नहीं कहाँ तक अच्छा होगा. इस छोटे से देश में ऐसी बहुत सी जरूरतें हैं जिसे बाहर वाले पूरा करते हैं, यह आसान होता है क्योंकि सीमाओं में कानूनी बंदिशें नहीं हैं. मिल -बाँट कर काम करना और आना- जाना सुविधाजनक है. 

परन्तु सुविधाओं के साथ परेशानियां भी आती हैं. बढ़ते हुए अपराध, सड़कों पर घूमते ओफेंन्डर्स, बिगड़ती अर्थव्यवस्था, रोजगार कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिनका निदान, सीमाएं अलग कर देने में ही दिखाई पड़ता है. खुले आम होते खून, दिन दहाड़े बढ़ती चोरियां, सड़कों पर खराब होता ट्रैफिक, स्कूलों, अस्पतालों में घटती जगह एवं उनका स्तर और पढ़े लिखों के बीच बढ़ती बेरोजगारी हर रोज डराती हैं  और दिमाग कहता है कि अलग हो जाना और फिर से अपनी मुद्रा, अपने खर्च, अपनी व्यवस्थाएं और कानून लागू करना ही एक मात्र रास्ता है.

वहीं एक डर अलग - थलग पड़ जाने का भी सालता है. एक छोटे से टुकड़े में एक आदमी के भरोसे फंस जाने का डर. इतिहास गवाह है जब सीमित संसाधनों से जरूरतें पूरी नहीं होती तो मंशा छीनने की हो आती है. दूसरों पर कब्जा करना, लूट पाट, और अनियंत्रित व्यवहार. 

एक हद्द तक अच्छा होता है किसी का अपने सिर पर नियंत्रण, कुछ सामान अधिकार, जिम्मेदारी और कानून जिसका पालन हर कोई करे. पूरी तरह से आजादी अनियंत्रण और स्वछंदता भी लेकर आ सकती है. 

फिलहाल स्थिति असमंजस की है. मेरी खासकर इसलिए कि बाहर आये तो इतना प्यारा यूरोप इतने आराम से घूमना बंद हो जायेगा  और फिर सुना है डैरी मिल्क चॉकलेट भी तो यूरोप से बाहर अच्छी नहीं मिलती .... 樂



Wednesday, 18 May 2016

ये न थी हमारी किस्मत....

हम जब बचपन में घर में आने वाली पत्रिकाएं पढ़ते तो अक्सर मम्मी से पूछा करते थे कि गर्मियों की छुट्टियां क्या होती हैं. क्योंकि पत्रिकाएं, गर्मियों में कहाँ जाएँ? कैसे छुट्टियां बिताएं, गर्मियों की छुट्टियों में क्या क्या करें और गर्मियों की छुट्टियों में क्या क्या सावधानी रखें, जैसे लेखों से भरी रहतीं। हमें समझ में नहीं आता था कि जिन गर्मियों की छुट्टी का इतना हो- हल्ला होता है वे गर्मी की छुट्टियां हमारी क्यों नहीं होतीं। जब सब बच्चे इन छुट्टियों में नानी - दादी के यहाँ जाते हैं या पहाड़ों की सैर पर निकल जाते हैं तो हम क्यों नहीं कहीं जाते? हमें क्यों स्कूल जाना पड़ता है ?तब मम्मी हमें समझातीं कि अभी वे लोग (रिश्तेदार, परिचित) हमारे यहाँ आ रहे हैं न, तो हम जाड़ों में वहां चलेंगे। गर्मियों में वहां बहुत गर्मी होती है, लू चलतीं हैं. अब हमारे सामने एक और दिलचस्प प्रश्न होता कि ये लू क्या चीज़ होती है और कैसे चलती है. 
असल माजरा यह था कि हम एक पहाड़ी शहर में रहा करते थे जहाँ स्कूल की छुट्टियां गर्मियों में नहीं, जाड़ों में हुआ करती थीं और इसलिए जब बाकि सब गर्मियों की छुट्टियों में हमारे यहाँ घूमने और आराम करने आते तब हम उनकी खातिरदारी करने में, पेड़ों से आड़ू, प्लम तोड़ कर खाने में और अपने स्कूल के रूटीन में व्यस्त होते। गर्मियों की छुट्टी मनाते बच्चों की किस्मत पर रश्क करते और अपनी पर लानत भेजते रहते।


हालाँकि इन सारे सवालों के उत्तर धीरे धीरे हमें समझ में आने लगे, लू - गर्म हवा के थपेड़ों को कहते हैं यह भी पता चल गया और बाकी बच्चों से छुट्टी की प्रतियोगिता भी समय के साथ समाप्त हो गईं. परन्तु गर्मियों की छुट्टियां हमारे लिए फिर भी एक पहेली ही बनी रहीं. वक़्त ने करवट ली, समय ने भारत से उठाकर हमें यूरोप में ले जा छोड़ा, जहाँ गर्मियों की छुट्टियां तो होती थी पर भारत जैसी न होती थीं. यूरोपवासी यूँ भी बेहद छुट्टी पसंद माने जाते हैं. कभी कभी तो लगता है कि छुट्टियां ही उनकी जिंदगी का मकसद है और बाकी का सारा काम वह इन छुट्टियों का आनंद उठाने की खातिर ही करते हैं. उसपर गर्मियों की छुट्टियां उनके लिए सबसे अहम होती हैं क्योंकि इन दिनों उन्हें भीषण ठण्ड, बोरिंग ओवरकोट और भारी जूतों से निजात मिलती है, मौसम बदलता है और वे प्रकृति के इस रूप का आनंद लेने के लिए बेताब हुए जाते हैं.  पूरा साल काम करते हैं, कमाते हैं, और सारा इन छुट्टियों में खर्च कर देते हैं.

भारत में जो गर्मियों की छुट्टियां भीषण गर्मी से राहत के लिए दी जातीं हैं वही यूरोप एवं पश्चिमी देशों में इससे इतर गर्मियों की छुट्टियां इस गर्मी का आनंद लेने के लिए दी जाती हैं. जहाँ गर्मियों की छुट्टी के नाम पर भारत में खस, शरबत, कूलर, शिकंजी, तरबूज, पहाड़ी स्थानों की सैर, स्कूल से मिला गृहकार्य और प्रोजेक्ट्स, और बड़ों की - "धूप में बाहर मत जाओ, तबियत खराब हो जाएगी, लू लग जाएगी " जैसी तक़रीर याद आती, वहीं यूरोप में इसके विपरीत लोग गरम देशों में, समुन्द्र के किनारे धूप में घंटों पड़े रहकर धूप सेकने को बेताब रहते हैं। तरबूज की जगह स्ट्रॉबेरी और चेरी इकठ्ठा करने खेतों पर जाते हैं, वहां कोई गृहकार्य गर्मियों की छुट्टियों के लिए नहीं दिया जाता, कोई बच्चा पहाड़ों पर या ठंडी जगह पर जाने की जिद नहीं करता. यहाँ तक कि हम, आदत से मजबूर हो कभी टीचर से कहते भी कि कुछ काम दे दीजिये, हम गर्मियों की छुट्टियों में कर लेंगे तो जबाब आता "गर्मियां काम करने के लिए नहीं होतीं, गर्मियां एन्जॉय करने के लिए होती हैं। गो एंड एन्जॉय द सन". और हमारे लिए यह सन (सूरज ) और गर्मी की छुट्टियां फिर से एक प्रश्न बन जाते, क्योंकि हमें तब उन छुट्टियों में कहीं घूमने नहीं बल्कि अपने घर (भारत) जाना होता जहाँ सूरज के साथ एन्जॉय करने बाहर नहीं निकला जाता, बल्कि उससे बचने के उपाय और साधन ढूंढें जाते हैं. अधिकाँश वक़्त घर के अंदर, कमरे में अँधेरा कर कूलर पंखे चला कर बैठने या पूरी दोपहर सोने में बीत जाता। 

वक़्त ने फिर करवट पलटी. अब छुट्टियां हमारी न होकर बच्चों की हो गईं. गर्मी भी समय के साथ बढ़ चली और उससे निबटने के तरीके भी बदल गए. गर्मियों की छुट्टियों के मायने भी बदल गए परन्तु हमारे लिए कुछ न बदला. हमारे लिए गर्मियों की छुट्टियां अब भी वही पहेली थीं. अब बहुत सी और छुट्टियाँ मिलती हैं, जब जी चाहे ली जा सकती हैं, जहाँ मन चाहे घूमने जाया जा सकता है, उनका खूब आनंद भी लिया जाता है. परन्तु यह "गर्मियों की छुट्टियाँ" आज भी हमारे लिए एक प्रश्न चिन्ह हैं. अब भी गर्मियों की छुट्टियां - अवकाश नहीं, बल्कि काम से अलग मिलने वाला वह समय था जिसमें हमें घर जाना था और दूसरे काम निबटाने थे. यूरोप में इसी समय स्कूल में सबसे अधिक छुट्टियां होती हैं तो यही समय होता है जो भारत जाकर इन छुट्टियों का सदुपयोग कर आयें.

यूँ कि - 
ये न थी हमारी किस्मत के गर्मी की छुट्टियां मिलतीं ... 
हम भी सूर्य स्नान करते या पहाड़ों की सैर होती ... 


Saturday, 23 April 2016

मेरी प्रिया की आँखें - (शेक्सपियर के सोंनेट 130 का भावानुवाद )

Shakespeare's Sonnet 130 - My mistress's eyes

My mistress' eyes are nothing like the sun;
Coral is far more red than her lips' red;
If snow be white, why then her breasts are dun;
If hairs be wires, black wires grow on her head.
I have seen roses damask'd, red and white,
But no such roses see I in her cheeks;
And in some perfumes is there more delight
Than in the breath that from my mistress reeks.
I love to hear her speak, yet well I know
That music hath a far more pleasing sound;
I grant I never saw a goddess go;
My mistress, when she walks, treads on the ground:
And yet, by heaven, I think my love as rare
As any she belied with false compare.

मेरी प्रिया की आँखें - (भावानुवाद  - शिखा वार्ष्णेय )
नहीं है सूर्य सी आँखें मेरी प्रिया की
उसके होंठों से अधिक लाल होता है मूंगा भी.
अगर होती है बर्फ भी सफ़ेद तो क्यों मटमैले है स्तन उसके। 
जो बाल होते तार अगर तो काले तार उसके सिर पर उगते.
देखे हैं लाल -श्वेत धारी वाले गुलाब मैंने 
पर उसके गालों पर नहीं दिखते ऐसे बूटे। 
हाँ कुछ खास इत्र भी होंगे सुगन्धित 
मेरी प्रिया की साँसों से आती हवा से.  
मैं सुनता हूँ उसे प्रेम से, जबकि जानता हूँ मैं 
संगीत होता है अधिक कर्णप्रिय मेरी प्रिया की ध्वनि से.
मानता हूँ मैं कि नहीं देखा मैंने किसी देवी को चलते 
जब चलती है मेरी प्रिया,रखती है ज़मीं पर कदम अपने 
फिर भी खुदा के वास्ते मेरा प्रेम है दुर्लभ, 
किसी भी झूठी उपमा से परे।  

(भावानुवाद  - शिखा वार्ष्णेय )

Monday, 4 April 2016

हवा का दबाव...

हम जैसे जैसे ऊपर उठते हैं
घटता जाता है हवा का दबाव.
भारी हो जाता है,
आसपास का माहौल. 
और हो जाता है,
सांस लेना मुश्किल.
ऐसे में जरुरी है कि,
मुँह में रख ली जाए,
कोई मीठी रसीली गोली,
अपनों के प्रेम की.
जिससे हो जाता है
सांस लेना आसान
और कट जाता है सफ़र
आराम से।

Tuesday, 29 March 2016

सावधान आगे ख़तरा है... ?

"बिहार की एक ट्रेन में, बोतल से पानी पी लेने पर एक युवक की कुछ लोगों ने जम कर पिटाई कर दी" सोशल मीडिया पर छाई इस एक खबर ने मुझे न जाने कितनी ही बातें याद दिला दीं जिन्हें मैं इस मुगालते में भुला चुकी थी कि अब तो बहुत समय बीत गया। हालात सुधर गए होंगें। 
पर क्या बदला है???

पूरे हिन्दुस्तान को तीन - तीन बार देखने के बाद भी पापा की हमारे साथ कभी बिहार देखने की हिम्मत नहीं पड़ती थी। जबकि बिहार से ज्यादा शायद ही किसी राज्य की ऐतिहासिक संस्कृति इतनी संपन्न रही हो। हमारे किसी स्थान का प्रस्ताव रखने पर भी "वह बिहार में है" इस वाक्य के साथ उसे सिरे से ख़ारिज कर दिया जाता। यहाँ तक कि कहीं और जाते हुए भी यदि रास्ते में ट्रेन बिहार से गुजरती तो, बेशक रात के 2 बजे हों पापा अपनी सीट पर चौकस बैठे रहते और हम दोनों बहनो को ऊपर की सीट पर चुपचाप सोये रहने की हिदायत दे दी जाती। बिहार की सीमा में घुसने से पहले ही हमें ताकीद कर दिया जाता कि टॉयलेट वगैरह कहीं जाना हो तो अभी निबट आया जाए फिर ट्रेन बिहार में घुस जायेगी तो अपने केबिन से नहीं निकलना है। गोया बिहार न हुआ गब्बर सिंह हो गया। कि चुपचाप अपनी सीट पर सो जाओ वर्ना बिहार आ जायेगा।
फिर बिहार से ट्रेन के गुजरने पर ही वह अपना बिस्तर सीट पर लगा कर आराम करते।

हमें समझ में नहीं आता था कि बिहार के बाहर निकलते ही हर एक मिलने -जुलने वाले से दीदी, जीजा, भौजी, भैया, काकी, काका का रिश्ता बना लेने वाले बिहार के लोग इतने क्रूर और और खतरनाक क्यों हैं कि हमारे वह पापा जिनके माथे पर ट्रेन के चम्बल के बीहडों तक से गुजरने पर शिकन नहीं आती, बिहार आते ही तनाव में आ जाते हैं। 

यूँ बिहार इस मामले में सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि भारत से बाहर भी खासा प्रसिद्द है। 
अभी कुछ ही दिनों पहले की बात है। मैं एक अंग्रेजी कंपनी के साथ भारत पर कुछ डॉक्यूमेंट्री के लिए काम कर रही थी। एक जगह पर बिहार का कुछ प्रसंग आने पर प्रोड्यूसर ने एडिटर को समझाते हुए कहा। "क्योंकि यह बिहार है। कभी इंडिया का सबसे संपन्न और शिक्षित समझे जाना वाला राज्य, जहाँ की संस्कृति किसी जमाने में दुनिया में सबसे आगे थी। परंतु आज यह शायद भारत ही नहीं दूनिया का सबसे गरीब और अशिक्षित राज्य है। जहाँ का क्रिमिनल रिकॉर्ड सर्वाधिक है। यहाँ के लोग अपने राज्य को संभाल ही नहीं सके"यह कह कर उसने मेरी तरफ देखा, वह अपने वक्तव्य पर मेरी सहमति की मोहर लगवाना चाह रहा था। और मैं चाह कर भी उसकी बात का खंडन नहीं कर पा रही थी। उसने उन फिल्मों के लिए महीनों भारत में बिताये थे, पूरा शोध किआ था। मैं कहना चाहती थी कि नहीं, सब राजनीति है। परंतु नहीं कह पाई। मैं जानती थी कि किसी भी जगह की मिट्टी में अच्छाई बुराई नहीं होती। उसे वहां रहने वाले आप और हम जैसे लोग ही अच्छा या बुरा बनाते हैं। 

मैं जानती थी। भारत में यात्रा के नाम पर आगरा, जयपुर, केरल और गोवा तक टूरिज्म सिमट जाता है। सबसे ज्यादा हिस्टोरिकल वैल्यू रखने वाले बिहार के लिए खुद टूरिस्ट एजंसियां "डेट्स नॉट सेफ" कह कर बिहार न जाने की हिदायत देती हैं। उस प्रोड्यूसर को भी वहां न जाने की सलाह दी गई थी। 
अत: उसके इस वक्तव्य पर मेरे पास धीरे से सहमति में सिर हिलाने के अलावा और कोई चारा नहीं था। 
इस उम्मीद के साथ कि काश आने वाले वक़्त में कोई चमत्कार होगा और बिहार की सीमा पर लगा "सावधान आगे ख़तरा है" का अप्रत्यक्ष बोर्ड हट जायेगा।

Sunday, 6 March 2016

बाजारवाद ही सही....

क्योंकि हमारे यहाँ प्यार दिखावे की कोई चीज़ नहीं है. नफरत दिखाई जा सकती है, उसका इजहार जिस तरह भी हो, किया जा सकता है. गाली देकर, अपमान करके या फिर जूतम पैजार से भी. परन्तु प्यार का इजहार नहीं किया जा सकता. उसे दिखाने के सभी तरीके या तो बाजारवाद में शामिल माने जाते हैं या फिर पश्चिमी संस्कृति का दिखावा. 

कहने को हम पश्चिमी देशों में मनाये जाने वाले यह ... मदर्स डे. फादर्स डे, लव डे आदि आदि नहीं मनाते. क्योंकि हम बहुत मातृ- पितृ भक्त हैं किसी एक दिन की हमें जरुरत नहीं। पर ज़रा दिल पर हाथ रखकर बताइये होश संभालने के बाद आपने कितनी बार अपने माता- पिता के प्रति प्यार का इजहार किया है? क्योंकि हमारे समाज में प्यार तो दिखाने की चीज है ही नहीं वह तो छुपाने की चीज है. ऐसे में इन दिवसों के बहाने यदि साल में एक बार भी माँ - पिता को "खास" होने का, प्रिय होने का या उनका ख्याल होने का एहसास हो जाए तो बेकार ही है. पैसे की बर्वादी है,और बाजारवाद को बढ़ावा देना है। 

सच पूछिए तो बात यह है कि प्रेम जताना और उसे महसूस करना सभी को अच्छा लगता है. ज़रा सोचिये आजकल के दौर में जहाँ बच्चे बड़े होते ही पढ़ाई या रोजगार के लिए अलग हो जाते हैं ऐसे में एक खास दिन अपनी माँ को याद कर उसे कुछ तोहफा भेजते हैं. ज़रा अंदाजा लगाइये उस माँ की ख़ुशी का. ऐसे में इन भावनाओं के बदले यदि बाजार का कुछ भला हो भी जाता है तो कम से कम मुझे तो इसमें कोई आपत्ति नहीं। 
असल में आज यहाँ मदर्स डे है. सुबह सुपर स्टोर गई तो वहां की रौनक देखने लायक थी. फूलों की बहार आई हुई थी. रंग विरंगे गिफ्ट पैकेटस और चॉकलेट्स से काउंटर सजे हुए थे. और सबसे प्यारी बात की खरीदारों में ९०% पुरुष दिखाई दे रहे थे. 

मेरी नजर एक पिता - पुत्र पर टिक गई. फूलों के काउंटर के आगे एक ट्रॉली पर करीब २ साल का एक बच्चा बैठा हुआ था और उसका पिता वहां से कुछ फूल चुन रहा था. २-३ फूलों के गुच्छे लेकर उसने उस बच्चे से पूछा - विच वन यू लाइक दी मोस्ट ? बच्चा कुछ खोया सा उसे देखने लगा. उसे समझ में नहीं आया कि क्या और क्यों उससे पूछा जा रहा है. पिता ने फिर पूछा - विच वन यू लाइक फॉर मॉम ? अब बच्चे ने तपाक से बड़ी अदा से, एक पर हाथ रख कर कहा. दिस वन. और पिता ने वह गुच्छा खरीद लिया। मेरी आँखें वहीँ, जहाँ उस माँ के रिएक्शन की कल्पना करके छलकने को हो आईं वहीं उन पिता - पुत्र को देखकर असीम आनंद का एहसास हुआ. 

आखिर क्योंकर हम इन प्रेम भरी मानवीय भावनाओं को नजरअंदाज कर देना चाहते हैं. कितना कुछ हम अपने लिए, अपने काम के लिए और अपनी सुविधाओं के लिए करते हैं. न जाने कितने बाजारवाद का उपयोग हम अपने स्वार्थ के लिए करते हैं तो एक दिन अगर इन खूबसूरत एहसासों के लिए भी कर लें तो बुरा क्या है ???

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