Wednesday, 28 December 2016

ब्रिक्सिट का कैसा हो क्रिसमस.


यूँ देखा जाए तो यह साल  पूरी दुनिया के लिए ही खासा उथल पुथल वाला साल रहा. वहाँ भारत में नोटबंदी हंगामा मचाये रहीउधर अमरीका में विचित्र परिस्थितियों में डोनाल्ड ट्रंप की जीत हो गई और इधर ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से किनारा कर लिया. 
हालाँकि रेफेरेंडम के नतीजे आने के तुरंत बाद ही इन्टरनेट पर उसे लेकर पछतावे की पोस्टें आने लगीं थीं. लोगों ने कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता के नियमों को खोजना शुरू कर दिया था और ब्रिक्सिट को एक नुकसान दायक फैसला कहा जाने लगा थाजिसके कालांतर में बेशक कुछ लाभ नजर आएँ पर वर्तमान में गंभीर हानि होने की संभावना जताई जा रही थी. 
अन्य देशों का तो पता नहीं पर ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति का जायज़ा उस वर्ष विशेष में होने वाले क्रिसमस उत्सव से आसानी से लिया जा सकता है. देश के आर्थिक हालातों का सीधा असर इस त्यौहार परइसकी तैयारियों और खरीदारी पर पड़ता है. क्रिसमस के आसपास बाजार में होने वाली रौनक से तुरंत ही देश की वर्तमान अर्थव्यवस्था का अंदाजा लगाया जा सकता है.
जैसे कुछ साल पहले रेसेशन के समयक्रिसमस पर बाजारों में भीड़ बेहद कम दिखाई दी थी. दुकाने खाली थीं और उस साल लोगों ने सिर्फ जरुरत भर की खरीदारी ही की थी. एक सर्वे के मुताबिक उस साल पोस्ट ऑफिस और कुरियर कंपनियों से बेहद कम उपहार भेजे गए थे. देश की आर्थिक मंदी का सीधा असर इस त्यौहार और उपहार लेने -देने के इसके रिवाज पर पड़ा था. वर्ना क्रिसमस की खरीदारी के लिए लगने वाली सालाना छूट पर ब्रिटेन के मॉल और बाजार इस कदर ठुसे-भरे होते हैं कि पाँव रखने की जगह भी मुश्किल से मिला करती है. क्रिसमस पर लोग नए घर से लेकर क्रिसमस ट्री तक खरीदते हैं और उनके लिए यह नए साल की नई शुरुआत की तरह होता है. 
ऐसा ही कुछ असर ब्रिक्सिट के बाद इस साल क्रिसमस आने पर देखा जा रहा है परन्तु यह मंदी के दौर से एकदम विपरीत है. लन्दन में प्रोपर्टी का गुब्बारा फटने को है. विश्लेषकों का कहना है कि क्रिसमस तक इसमें २०,००० पौंड्स तक की गिरावट आ सकती है. 
यूरोपीय संघ जनमत संग्रह के परिणामों की घोषणा के कुछ मिनटों के भीतर ही FEST 100 में 122 बिलियन पौंड्स मूल्य की गिरावट देखी गई. 1985 के बाद से पाउंड इतना कभी नहीं घटा।
लन्दन में मकानों की कीमत में 20% तक की कमी आई है ब्रिक्सिट अब अधिक लोगों को एक सस्ता घर खरीदने के लिए बढ़ावा दे सकता है हालाँकि बैंक्स अपनी ब्याज दर बड़ा कर एक बाधा खड़ी कर सकतीं हैं. 
लन्दन बेशक दुनिया के सबसे महंगे शहरों में एक माना जाता हो परन्तु डेलॉइट के शोध के अनुसारडिजाइनर और अन्य विलासिता के सामान डॉलर के संदर्भ में अब किसी भी और जगह से ब्रिटेन में सस्ते मिल रहे हैं. 
यह ब्रिक्सिट मतदान के बाद स्टर्लिंग में गिरावट की प्रवृत्ति से जुड़ा हुआ है, जो पर्यटकों की खर्च करने की क्षमता को बढ़ा रहा है।
जून के बाद से पाउंडडॉलर के मुकाबले 17% से अधिक गिर गया है।
बरहाल ब्रिक्सिट से ब्रिटेन को कितना फायदा होगा या कितना नुकसान यह तो आने वाला समय ही बताएगा परन्तु ब्रिक्सिट का यह क्रिसमस जरूर धमाकेदार होने वाला है. लोगों ने जमकर खरीदारी करनी शुरू कर दी है. शॉपिंग मॉल और सड़कों पर पर्यटकों और खरीदारों का रेला लगा हुआ है और ऑक्स्फोर्ड स्ट्रीट अपने शाही अंदाज में चमक रही है.
लन्दन के होटल, रेस्टोरेंट्स के दाम भी पिछले कुछ दशकों के मुकाबले पहली बार इस साल सबसे कम नजर आ रहे हैं और यह ब्रिक्सिट की ही मेहरबानी है कि अब हर कोई क्रिसमस और नए साल की पार्टी करने के लिए लन्दन का रुख कर रहा था. अमेरिका और एशिया के व्यापारियों ने शहर के महंगेशानदार बॉलरूम और पार्टी हॉल इस साल के लिए ही नहीं बल्कि अगले दिसंबर के लिए भी अभी से बुक कर लिए हैं.
तो तैयार हो जाइए ब्रिटेन के इस शानदार उत्सव में भाग लेने के लिए. उसकी भव्यता अनुभव करने के लिए आप आमंत्रित हैं. इस बार खास गोल्डन टूर्स लेकर आप शहर को इस खास सीजन के लिए सजता देख सकते हैं. चाहें तो थेम्स नदी के ऊपर होने वाली खास और शानदार आतिशबाजी का आनंद ले सकते हैं या बॉक्सिंग डे की सेल में जम कर खरीदारी कर सकते हैं. कहा जा रहा है कि लुइ बिट्टन का हैण्ड बैग इस साल लन्दन में सबसे सस्ता बिक रहा है तो चढ़ा लीजिए अपनी आस्तीन और हो जाइए तैयार अपने सपनों को कुछ रंग देने के लिए क्योंकि ब्रिक्सिट की कृपा से इस साल जैसा भव्य और धमाकेदार क्रिसमस सीजन होने वाला है शायद ब्रिटेन में पहले कभी नहीं हुआ. 

Thursday, 15 December 2016

यथार्थ के आकाश पर कल्पना की उड़ान... 'उडारी"


अरुणा सब्बरवाल जी का नया कहानी संग्रह जब हाथ में आया तो सबसे पहले ध्यान आकर्षित किया उसके शीर्षक  उडारीने ।जैसे हाथ में आते ही पंख फैलाने को तैयार. लगा कि अवश्य ही यथार्थ के आकाश पर कल्पना की उड़ान लेती कहानियाँ होंगी और वाकई पहली ही कहानी ने मेरी सोच को सच साबित कर दिया ।

संग्रह के शीर्षक वाली पहली कहानी - उडारी- कठोर यथार्थ पर मानवीय संवेदना और प्रेम की कहानी है. जज़्बातों की उड़ान की कहानी है. अपनी भावनाओं और सामाजिक बंधनों में बंधी एक औरत की कहानी है जो अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना चाहती है और सामाजिक बंधनों को परे रख, अपने पंख पसार कर, खुशियों के आकाश में उड़ जाना चाहती है.  

इस संग्रह में कुल पन्द्रह कहानियाँ हैं और सभी कहानियां एक वृहद कैनवास पर जीवन के विभिन्न आयामों को अनेक रंगों में चित्रित करती हैं जिसमें प्रेम का रंग सबसे अहम् है. 
प्रत्येक कहानी जीवन से जुड़ी कहानी है जैसे हमारे ही आसपास की कोई घटना हो. कहानी पढते हुए उसके चरित्र अपने से ही लगने लगते हैं. कई बार लगता है कि जैसे उस व्यक्ति को हम पहचानते हैं या यह तो मेरी ही कहानी है और यह किसी भी कहानी की सफलता का मजबूत मापदंड है. सभी कहानियों का कथ्यचरित्र चित्रणऔर कथा विन्यास प्रभावशाली है.
अरुणा जी कि इन कहानियों की शैली अधिकांशत: संवादात्मक है. लेखिका कभी स्वयं से तो कभी उसके पात्र स्वयं से संवाद करते हुए कहानी को गति देते हैं. ये सम्वाद जितने सच्चे प्रतीत होते हैं उतने ही रोचक और सरल भी हैं अत: पाठक के मन पर तुरंत ही प्रभाव छोड़ते हैं. 

अरुणा जी ने भारत और यूके का जीवन समान रूप से देखा और जिया है अत: ज़ाहिर है कि दोनों देशों के सामाजिक परिवेश का संगम उनके लेखन में नजर आता है.

संग्रह की - मरीचिकापहली छुअनमी टूतुम और मैंसोल मेट आदि कहानियों मेंएक आम इंसान की ज़िंदगी के छोटे-छोटे अहसासअनुभूतियाँप्रेम और जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं के बीच संघर्ष. इच्छाओंअरमान और समाज के यथार्थ के बीच पिसते इंसान और उसकी भावनाओं का एक मर्मस्पर्शी चित्रण है. 

कहानी - उसका सच और ठहरा पानीमानवीय संवेदना का चरम हैं. हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में भावनाओं का ठहराव और परिवेश का कठोर सत्य पात्रों के चरित्र और संवादों के माध्यम से प्रभावशाली तरीके से उभरता है. जब दाम्पत्य जीवन में शक का कीड़ा सिर उठाने लगे तो उसके परिणाम कितने दुखद हो सकते हैं इसका  बहुत मार्मिक रूप प्रस्तुत किया है -कहानी उसका सचमें ।
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वहीं "वह पहला दिनऔर बेनाम रिश्तेजैसी कहानियों में अपने देश से बाहर रहने की और देश में वापस लौटने की छटपटाहट और नोस्टाल्जिया लगातार झलकता है.  

इस संग्रह में एक बेहद खूबसूरत कहानी है - इंग्लिश रोज - यह भारतीय मानसिकता और संस्कृति की आड़ में उसकी कमियां बताती और पश्चिमी संस्कृति के प्रति उसके पूर्वाग्रह को ध्वस्त करती एक सशक्त और पठनीय कहानी है. एक भारतीय नारी अपने विवाहित जीवन के कटु अनुभव के बाद एक नया कदम उठाना चाहती है. उसका अतीत और समाज उसे डराता है. कहानी उसके मानसिक संघर्ष को चित्रित करती है और पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के बारे में एक सकारात्मक दृष्टिकोण उपलब्ध कराती है.

मुझे संग्रह की सबसे खूबसूरत कहानियाँ लगीं - शीशे का ताजमहल और १६ जुलाई १०८०. 
दोनों ही कहानियाँ मानवीय ह्रदय की तह में जाकर उसकी संवेदना को पाठक के ह्रदय में कुछ इस तरह रोपित करती हैं कि पाठक स्वयं को उसी परिस्थिति और जगह पर महसूस करने लगता है. दोनों ही कहानियों का विषय लगभग एक जैसा है और दोनों कहानियाँ अपने पात्रों के माध्यम से अपने मोह और स्वार्थ से परे, समाज और उसके लोगों के भले के लिए अपना योगदान और त्याग देने के लिए प्रेरित करतीं हैं.
कहानी का कथानक और भावनाओं पर पकड़ इतनी मज़बूत है कि कहानी कहीं भी उबाऊ नहीं होती और अंत तक पाठक की उत्सुकता बनी रहती है.  

लेखिका की कथानकचरित्रोंभावों और प्रस्तुतीकरण पर पकड़ मज़बूत है. बस एक कमी बार बार पुस्तक पढते हुए खलती है- वह है लगभग हर पन्ने पर टाइपिंग या प्रूफ रीडिंग की गलतियां. हालाँकि ये गलतियां सूक्ष्म हैं और पूर्णत: प्रकाशन सम्बन्धी हैं फिर भी कहानियों के प्रवाह को क्षण भर के लिए रोकती सी लगती हैं. हालाँकि कथानक और उनका शिल्पभाव ऐसा है कि इसके बावजूद भी पूरी कहानी पढ़ा ले जाता है. 
आखिर में कहूँगी कि उडारी”, विविध विषयों से भरा हुआदो भिन्न समाज और परिवेश में आम जीवन को दर्शाता हुआ एक सशक्त कहानी संग्रह है. आशा है कि लेखिका अपनी कलम से ऐसे और भी सुन्दर उपहार पाठकों को देती रहेंगी.


      

Thursday, 8 December 2016

हाय दिसंबर तुम बहुत प्यारे हो...

सुबह की धुंध में 
उनीदीं आँखों से 
देखने की कोशिश में 
सिहराती हवा में,
शीत में बरसते हो,
बर्फीली ज्यूँ घटा से. 
लिहाफों में जा दुबकी है 
मूंगफली की खुशबू. 
आलू के परांठे पे 
गुड़ मिर्ची करते गुफ्तगू. 
लेकर अंगडाई क्या मस्ताते हो 
हाय दिसंबर तुम बहुत प्यारे हो.  

Tuesday, 22 November 2016

बेहतरीन इंसान की मिसाल भी थे डॉ विवेकी राय (एक श्रद्धांजलि)

एक बेहद दुखद सूचना अभी अभी मिली है कि प्रख्यात हिंदी साहित्यकार डॉ. विवेकी राय का आज सुबह पौने पांच बजे वाराणसी में निधन हो गया है। बीते 19 नवंबर को ही उन्होंने अपना 93वां जन्मदिन मनाया था. 
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यश भारती से भी सम्मानित विवेकी राय जी ने हिंदी में ललित निबंध, कथा साहित्य, उपन्यास के साथ साथ भोजपुरी साहित्य में भी एक आंचलिक उपन्यासकार के रूप में खूब ख्याति अर्जित की थी और उनकी रचनाएं मैंने ब्लॉग्स पर पढ़ीं थी.

यूँ मैं विवेकी राय जी से कभी मिल नहीं पाई, परंतु मेरे जीवन में उनका एक विशेष स्थान है - मेरी पहली पुस्तक (समृतियों में रूस)पर पहली टिप्पणी स्वरुप उनके ही आशीर्वचन हैं. 
असल में मैंने अपने ब्लॉगर साथियों के उत्साह वर्धन पर पुस्तक लिख तो ली थी परंतु उसे प्रकाशित करवाने के लिए सशंकित थी. मुझे एक ईमानदार सलाह की जरुरत थी. तब मैंने एक मित्र के द्वारा पुस्तक की पाण्डुलिपि उन्हें भिजवाई कि यदि हो सके तो कुछ पन्ने पढ़कर ही सही वह यह बता सकें कि वह एक यात्रासंस्मरण के रूप में छपवाने लायक है भी या नहीं.
वे अस्वस्थ थे, उनकी आँखों में तकलीफ रहती थी, ज्यादा पढ़ नहीं पाते थे. परन्तु मुझे सुखद आश्चर्य हुआ जब उन्होंने थोड़ा -थोड़ा करके पूरी किताब पढ़ी और मेरे जीवन की सबसे अनमोल और खूबसूरत टिप्पणी मुझे दी. 
मेरे मित्र के यह पूछने पर कि "किताब कैसी लगी ?" उन्होंने दो शब्द कहे " लेडी सांकृत्यायन" यह सुनकर मित्र हँसे और पूछा "कुछ ज्यादा नहीं हो गया ?" वे बोले "बिलकुल नहीं, बस भाषा पर थोड़ा सा और कमांड आ जाये और वह समय के साथ आ जायेगा" और इसके बाद किताब पर आशीर्वचन स्वरुप उन्होंने कुछ पंक्तियाँ भी लिखकर भेजीं.
मेरे लिए उनके ये शब्द एक ऐसी जड़ी बूटी की तरह थे जिसने मेरे मन के न सिर्फ सब संशय दूर कर दिए बल्कि आगे चलने का सही मार्ग भी मुझे दिखाया. 
एक सशक्त, वरिष्ठ साहित्यकार का एक एकदम नए रचनाकार के प्रति यह विनीत व्यवहार न सिर्फ मुझे उनके प्रति आदर और श्रद्धा से भर गया बल्कि अब तक वरिष्ठ और स्थापित साहित्यकारों के गुरूर पूर्ण व्यवहार के बारे में सुनी हुई बातों को भी धूमिल कर गया था. 
एक ऐसे बेहतरीन रचनाकार से न मिल पाने का अफ़सोस मुझे आजीवन रहेगा और उनके शब्द मुझे हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे 
हिन्दी साहित्य के इस पुरोधा को शत शत नमन .

Tuesday, 27 September 2016

लन्दन में रथयात्रा ... एक चित्रमाला.

यूँ मैं बहुत धार्मिक नहीं और पूजा पाठ में तो यकीन न के बराबर है. पर मैं नास्तिक भी नहीं और उत्सवों में त्योहारों में बहुत दिलचस्पी है. उनमें यथासंभव भाग लेने की कोशिश भी हमेशा रहा करती है.
ऐसे में जब पता चले कि अपने ही इलाके में जगन्नाथ भगवान की रथयात्रा का आयोजन है तो जाए बिना रहा नहीं जाता. भारत में, पुरी में तो इस तरह के आयोजन देखने का न कभी संयोग हुआ न ही कभी हिम्मत, परन्तु लन्दन में इन आयोजनों के साथ अनुशासन और सुरक्षा के ऐसे इंतजाम होते हैं कि इनमें शामिल होने के लिए सिर्फ मन होने से काम चल जाता है हिम्मत जुटाने की जरुरत नहीं पड़ती.
तो इस रथयात्रा की आँखों देखी झलकियां हाज़िर हैं - हालाँकि आयोजन करने वाले हरे राम हरे कृष्ण वाले थे यानि कि इस्कॉन ने आयोजन किया था परन्तु जो भी था दर्शनीय तो अवश्य ही था.
कार्यक्रम के मुताबिक रथयात्रा - इल्फोर्ड टाउन हॉल से ठीक दोपहर बारह बजे शुरू होकर करीब एक मील चलती हुई वेलेंटाइन पार्क में ठीक १ बजे पहुंची. समय का अनुशासान आवश्यक था क्योंकि इस दौरान इस मुख्य सड़क पर वाहनों का आवागमन बंद किया हुआ था.
पार्क में एक छोटा सा मेला लगा हुआ था, वहीँ भगवान जगन्नाथ के विश्राम और भंडारे की व्यवस्था थी.
तो चलिए चलते हैं - कदम दर कदम, तस्वीरों के ज़रिये, इस यात्रा के साथ -
 भगवान के लिए सड़क बुहारती एक भक्तिन 


सड़क बंद का आधिकारिक नोटिस  


 प्रसाद बांटती एक स्वयंसेवी 



 रथ खींचते भक्त 


नाचते गाते लोग  





ये बच्चियां पूरी तरह तैयार थी उत्सव के लिए. बीच वाली पूरे रास्ते अपने साथियों को जगन्नाथ भगवान और उनके परिवार की कहानी सुनाती आ रही थी.

 पार्क में लगा हुआ छोटा सा मेला 



 भगवान का अस्थाई मंदिर और पूजा की थालियाँ









नाश्ता और केक 

 भंडारा 


Saturday, 24 September 2016

जियो जी भर...

अमरीका के एक प्रसिद्ध लेखक रे ब्रैडबेरि का कहना है कि अपनी आँखों को अचंभों से भर लोजियो ऐसे कि जैसे अभी दस सेकेण्ड में गिर कर मरने वाले होदुनिया देखो, यह कारखानों में बनाए गए या खरीदे गए किसी भी सपने से ज्यादा शानदार है. 

वाकई घुमक्कड़ीयायावरी या पर्यटन ऐसी संपदा है जो आपके व्यक्तित्व को अमीर बनाती है और शायद इसलिए आजकल यह दिनों दिन बेहद लोकप्रिय होती जा रही है. 
देशोंस्थानों की खोज से शुरू हुई यात्राएं, धार्मिक तीर्थ यात्राओं से होती हुई आज - स्वास्थ्यज्ञानव्यापार और सबसे अधिक मनोरंजन तक पहुँच गईं हैं और आलम यह है कि अब फुर्सत के कम से कम पलों में भी हम छोटी ही सही किसी यात्रा पर निकल जाने के लिए लालायित और बेचैन रहते हैं. शायद यही वजह है कि कुछ देश तो सिर्फ पर्यटन से ही विकसित हुए हैं और आज भी मुख्यत: उसी पर निर्भर हैं.

जहाँ फ़्रांस दुनिया का ऐसा देश है जहाँ सबसे अधिक पर्यटक जाते हैं वहीँ स्विट्जरलैंडस्पेनग्रीस आदि ऐसे देश हैं जहाँ की लगभग पूरी अर्थव्यवस्था ही पर्यटन पर चलती है. स्विट्जरलैंड ने अपने खूबसूरत पहाड़ों और प्रकृति को इतनी खूबसूरती से सहेजा है कि यात्री उसकी ओर खिचे चले जाते हैं वहीँ स्पेन ने अपने समुद्री तटों को पर्यटन का मुख्य आकर्षण बनाया है. अमरीका अपने वैभवपूर्ण लॉस वेगास के लिए प्रसिद्द है तो भारत में गोवा के तटराजस्थान की एतिहासिक इमारतें और दक्षिण के अद्दभुत मंदिर पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हैं.

कहने का तात्पर्य यह कि प्रत्येक देश या स्थान की अपनी विशेषताएं होती हैं परन्तु उन्हें पर्यटन के लिए आकर्षक बनाने के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक होता है उन्हें यात्रियों के लिए सुरक्षितसुलभ और सुविधाजनक बनाना. और यहीं पर कुछ स्थान दूसरे कुछ स्थानों से बाजी मार ले जाते हैं.
यूँ दुनिया का हर देश क्या हर स्थान किसी न किसी मायने में एक दूसरे से भिन्न होते हैं. आपको यदि यात्रा करनी ही है तो यह बिलकुल जरुरी नहीं कि आप कोसों दूर किसी मशहूर विदेशी जगह पर जाएँ. अपने आसपास ही, कहीं, कुछ दूरी पर जाकर देखियेमन की आँखें खोलिए तो आप पायेंगे वहाँ भी बहुत कुछ ऐसा है दूसरों से जुदा है.

इंग्लैंड में लन्दन से सिर्फ दो घंटे की ड्राइव परदक्षिण पश्चिमी और मध्य इंग्लैण्ड में स्थितप्राकृतिक सुन्दरता से परिपूर्ण एक इलाका है "कोट्स वोल्ड" करीब पच्चीस मील में फैले हुए इस क्षेत्र में छोटे छोटे कई एतिहासिक और पुरातन गाँव हैंगाँवों के बीच से बहती हुई नदियाँ हैंछोटे छोटे टीले से पहाड़ हैं. एक महानगर और दुनिया की आर्थिक राजधानी के इतने करीब होने पर भी एक बिलकुल नया परिवेश और वातावरण वहाँ देखने को मिलता है. सडकों से लेकर घरों तक और दुकानों से लेकर वहाँ के निवासियों तक में एक स्पष्ट भिन्नता दिखाई पड़ती है.
पर्यटन हमारे लिए ऐसी ही नई दुनिया के दरवाजे खोलता है. अपनी सिमटी हुई दुनिया से निकाल कर अलग संस्कृतिपरिवेशखानपान आदि से हमें अवगत कराता है और हमें बताता है कि तुम जहाँ जीते हो वह इस क़ायनात का एक बेहद छोटा सा टुकड़ा है. अपने कुएँ से बाहर निकलो और देखो कि यह संसार कितना बड़ा और विविध है. 

एक रोमन स्टोइक दार्शनिक सेनेका के अनुसार यात्रा और स्थान में बदलाव मन में नई शक्ति का संचार करते हैं. तो यदि आपको भी चाहिए यह मन की शक्ति तो निकलिए अपने खोल सेबंद कीजिये अपने कमरे में लगे टेलीविजन को और निकल पढ़िये जहाँ भी डगर ले चले. 
वैसे भी किसी शायर ने क्या खूब कहा है –
मस्तूल तन चुके हैं बहती बयार में,
बाहें फैलाए दुनिया तेरे इंतज़ार में.




Tuesday, 28 June 2016

अब आगे क्या ? (UK's EU referendum, 2016)

वह बृहस्पतिवार का दिन था - तारीख 23 जून 2016  - जब एक जनमत संग्रह के लिए मतदान किया जाने वाला था. इसमें वोटिंग के लिए सही उम्र के लगभग सभी लोग वोट कर सकते थे वे फैसला लेने वाले थे कि यूके को  योरोपीय संघ का सदस्य बना रहना चाहिए या उसे छोड़ देना चाहिए. 
इस जनमत संग्रह में  30 मिलियन से अधिक लोगों ने मतदान किया। यह 1992 के आम चुनाव के बाद से ब्रिटेन के मतदान में सबसे अधिक संख्या थी। सभी यूके के भविष्य निर्धारण करने में अपना योगदान देने के इच्छुक थे. 
24 जून की सुबह यूके  निवासियों को नाश्ते की मेज पर इस जनमत संग्रह का फैसला भी मिला. जिसने जहाँ खासकर अधिकाँश लन्दन वासियों को शॉक में डाला वहीं बहुत लोग इससे बेहद खुश हुए.  इस रेफेरेंडोम के अनुसार 52 प्रतिशत मतदाताओं ने यूरोपीय संघ से बाहर होने के पक्ष में अपना वोट दिया. यूके की जनता ने यूरोपीय संघ छोड़ने का निर्णय किया था. वह अलग होकर अपने फैसले खुद लेना चाहते हैं. अपने पैसे, कानून और व्यवस्था का इस्तेमाल स्वयं अपने मूल्यों पर करना चाहते हैं.  यह एक एतिहासिक दिन बन गया और इस फैसले के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने अपने पद से इस्तीफ़ा देने की घोषणा कर दी.
अभी लगभग 2 साल पहले की ही बात है जब यूके के ही एक हिस्से स्कॉटलैंड में भी इसी तरह का एक जनमत संग्रह हुआ था जहाँ स्कॉटलैंड वासियों को यूके में बने रहने और यूके से अलग होने के लिए अपना वोट देना था. तब इंग्लैंड सहित पूरे देश ने "एकता में ही शक्ति है" जैसा नारा दिया था तब स्कॉटलैंड वासियों ने इसका मान रखते हुए यूके  साथ रहने के पक्ष में अपने वोट दिए थे. और अब उसी ग्रेट ब्रिटेन ने स्वयं ईयू से अलग होने का निर्णय किया है. 
गौरतलब है कि पूर्वोत्तर इंग्लैंड, वेल्स और मिडलैंड्स में अधिकतर मतदाताओं ने यूरोपीय संघ से अलग होना पसंद किया है जबकि लंदन, स्कॉटलैंड और नॉर्दन आयरलैंड के ज्यादातर मतदाता यूरोपीय संघ के साथ ही रहना चाहते थे. और अब सम्भावनाएं जताई जा रही हैं कि अब कम से कम स्कॉटलैंड और नॉर्दन आयरलैंड यूके से अलग होकर यूरोपीय संघ में शामिल होना चाहेंगे. और युनाईटेड किंगडम शायद इतना युनाईटेड नहीं रह जाएगा. 
ज़ाहिर है कि EU छोड़ने के पक्ष में जिन्होंने अपना मत दिया उनमें लन्दन से बाहर के बुजुर्गों की संख्या सर्वाधिक थी जो पिछले दस साल में दूसरे देशों से ब्रिटेन में आकर बसने वालों की बढ़ती संख्या से बहुत प्रसन्न नहीं हैं और उन्हें लगता है कि इनके आने से उन्हें मिलने वाले बेनेफिट्स और नौकरियों में कटौती हुई है. देश में बढ़ते रोड साइड अपराध, चोरियां और बिगड़ती व्यवस्थाओं की वजह भी अप्रवासियों को माना जाता रहा है. 
ईयू से अलग होने की एक मजबूत वजह यह भी बताई जाती रही कि अगर ब्रिटेन ईयू से हटता है तो देश की सरकारी स्वास्थ्य  संस्था NHS अपनी जर्जर स्थिति से उबर जायेगी क्योंकि ईयू को हर हफ्ते दी जाने वाली राशि ब्रिटेन अपनी इस स्वास्थ्य योजना पर इस्तेमाल कर सकेगा.

पिछले 20 वर्षों से यूके  में रह रही एक गृहणी संगीता शाह का कहना है कि उन्होंने देखा है कि कैसे पिछले सालों में ईयू इमिग्रेशन का कानून बदला गया है और कैसे हाल में हुए बदलावों का ब्रिटेन पर एक नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, उनका कहना है कि हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे -: स्कूल प्रवेश, आवास और साथ ही अपराध दर पर बहुत असर पड़ रहा है । उनका  मानना है कि ये अप्रवासी बेनेफिट्स का अतिरिक्त लाभ लेते हैं, जो उन्हें ब्रिटेन करदाताओं के मेहनत से कमाए पैसे का दुरुपयोग लगता है । उनका कहना है कि वे अपने बच्चों और भावी पीढ़ियों के लिए ऐसा जीवन नहीं चाहती इसलिए उन्होंने जीवन यापन के लिए बढ़ने वाली कीमतों के खतरे के वावजूद ईयू के निकलने के पक्ष में अपना वोट दिया. 

वहीं एक जर्मन ट्रेड फेयर कंपनी में एक हेड , लन्दन निवासी बिंदिया वर्मा इस फैसले से आहत हैं.उनके लिए यह फैसला पूरी तरह अनपेक्षित था और एक बहुत बड़े आघात के रूप में आया है. उनके अनुसार इस फैसले का बड़ा प्रभाव उन जैसी कंपनी पर पड़ेगा क्योंकि कंपनियां अब अपना निवेश रोक सकती हैं जब तक कि ईयू और दुनिया के बाकि देशों से अधिक भरोसे वाली ताज़ा डील सामने न आये. वे अपने उन युरोपीय दोस्तों के लिए भी दुखी हैं जिन्होंने ब्रिटेन को अपना घर बना लिया है और अब वे खुद को यहाँ अप्रिय और अवांछित महसूस करेंगे. बिंदिया कहती हैं कि यही नहीं बल्कि शायद इस फैसले से हमने अपने बच्चों एवं भावी पीढी से बिना सीमा बंदी के यूरोप यात्रा और काम करने के अवसरों को भी छीन लिया है. 

आंकड़ों के अनुसार ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर होने के फ़ैसले के बाद दुनिया भर में बाज़ार में गिरावट देखने को मिल रही है.अकेले ब्रिटेन के स्टॉक मार्किट में ही एक सौ पच्चीस बिलियन का नुक्सान हुआ है. 
इस फैसले से अधिकाँश युवा वर्ग अधिक निराश दिखाई देता है. खासकर लन्दन जैसे बहु संस्कृति वाले शहर के लिए तो यह फैसला दुखद नहीं तो थोड़ा निराशाजनक अवश्य दिखाई पड़ता है. 

लन्दन में इकोनिमिक्स की एक छात्रा सोम्या के अनुसार भी यह फैसला ठीक नहीं है वह कहती है कि हम पहले से ही माइनस -3294 मिलियन पाउंड्स के क़र्ज़ में हैं अब व्यापार में नुक्सान और अधिक हो सकता है. 

जो भी हो, यह कहा जा सकता है कि यह हो सकता है कि इस फैसले के कुछ दूरगामी फायदे निकल कर आयें. हो सकता है कि ईयू की सरपरस्ती से निकल कर यूके अपना अलग दृण निर्माण करे. ईयू से निकल कर बाकि दुनिया के देशों से व्यापारिक रिश्तों में बढ़ोतरी की संभावनाएं जताई जा रही हैं परन्तु यह भी ज़ाहिर है कि फिलहाल यूके की अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा और जीवन यापन की कीमत बढ़ेगी. इसमें कोई संदेह नहीं अपने पैरों पर खड़े होकर सफलता तक तक पहुँचने के लिए यूके को एक लंबा और कठिनाई से भरा रास्ता पार करना होगा. 

इस एतिहासिक फैसले से यूके, कठिनाई की आग में तप कर, निखर कर निकलेगा या टूट कर बिखर जाएगा- यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा.



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